Uttarakhand Bhu Kanoon Action Nainital उत्तराखंड में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी सरकार के सख्त भू-कानून का असर जमीनी स्तर पर दिखने लगा है। देवभूमि की जमीनों के अवैध खरीद-फरोख्त और लैंड यूज (भू-उपयोग Uttarakhand Bhu Kanoon Action Nainital ) बदलने वालों के खिलाफ प्रदेश सरकार ने कड़ा रुख अख्तियार कर लिया है। इसी क्रम में नैनीताल जिले से एक बड़ी प्रशासनिक कार्रवाई की खबर सामने आई है। जिला प्रशासन ने निर्धारित प्रयोजन के विपरीत भूमि का उपयोग करने वाले सात गंभीर मामलों में त्वरित एक्शन लेते हुए कुल 1.822 हेक्टेयर (91 नाली 01 मुट्ठी) भूमि को राज्य सरकार में निहित (जब्त) कर लिया है।
यह पूरी कार्रवाई जिलाधिकारी ललित मोहन रयाल के कुशल निर्देशन और उप जिलाधिकारी (SDM) नवाज़िश खलिक की अगुवाई में अमल में लाई गई है। प्रशासन की इस ताबड़तोड़ कार्रवाई से जिले के भू-माफियाओं और नियमों को ताक पर रखकर जमीन खरीदने वाले बाहरी तत्वों में हड़कंप मच गया है।
जिलाधिकारी की दोटूक: कानून का उल्लंघन करने वाले बख्शे नहीं जाएंगे
Uttarakhand Bhu Kanoon Action Nainital मामले की विस्तृत जानकारी देते हुए नैनीताल के जिलाधिकारी ललित मोहन रयाल ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार की मंशा उत्तराखंड में भूमि क्रय-विक्रय को पूरी तरह से निष्पक्ष, पारदर्शी और कानूनसम्मत बनाना है। उन्होंने कड़े शब्दों में चेतावनी दी है कि राज्य सरकार के सख्त भू-कानूनों का मखौल उड़ाने वाले या अनुमति की शर्तों का उल्लंघन करने वाले किसी भी व्यक्ति को बख्शा नहीं जाएगा। नियमों का उल्लंघन पाए जाने पर भविष्य में भी इसी प्रकार की कठोर दंडात्मक कार्रवाई जारी रहेगी।
क्या है पूरा मामला और Uttarakhand Bhu Kanoon Action Nainital से कहां हुई कार्रवाई?
उप जिलाधिकारी (SDM) न्यायालय, नैनीताल में चल रहे सात अलग-अलग प्रकरणों की सुनवाई के बाद यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया गया है। यह कार्रवाई उत्तर प्रदेश जमींदारी विनाश एवं भूमि व्यवस्था अधिनियम, 1950 की उत्तराखण्ड राज्य में यथाप्रवृत्त धारा 166/167 के तहत की गई है।राजस्व विभाग की टीम द्वारा की गई स्थलीय जांच और राजस्व अभिलेखों के मिलान में दो मुख्य प्रकार के बड़े उल्लंघन पाए गए।
1. धार्मिक प्रयोजन के नाम पर ली जमीन, मौके पर मिली खाली
Uttarakhand Bhu Kanoon Action Nainital जांच में पाया गया कि नैनीताल जिले के ग्राम कमड़ा (पट्टी मल्ली कुटौली) और ग्राम शीतला (पट्टी मल्ली कुटौली) में विभिन्न बाहरी व्यक्तियों और संस्थाओं द्वारा धार्मिक गतिविधियों के संचालन के नाम पर कुल 1.562 हेक्टेयर भूमि क्रय की गई थी। नियम के मुताबिक, इस जमीन पर धार्मिक अनुष्ठान, संस्था या जनहित के कार्य होने चाहिए थे। लेकिन जब राजस्व टीम ने मौके पर जाकर स्थलीय निरीक्षण किया, तो वहां कोई भी धार्मिक गतिविधि संचालित नहीं पाई गई। करोड़ों रुपये की यह कीमती जमीन सालों से यूं ही खाली पड़ी हुई थी, जो कि भू-कानून की शर्तों का सीधा उल्लंघन था।
2. कृषि के नाम पर सौदा, मौके पर पाई गई बंजर
इसी तरह का एक और बड़ा फर्जीवाड़ा ग्राम सतबूंगा (पट्टी सतबूंगा) में देखने को मिला। यहां कृषि (खेती-बाड़ी) के विशेष प्रयोजन के लिए 0.260 हेक्टेयर भूमि क्रय करने की अनुमति सरकार से ली गई थी। अनुमति की शर्तों के अनुसार इस जमीन पर उन्नत खेती या बागवानी की जानी अनिवार्य थी। परंतु, मौके पर जांच अधिकारी तब हैरान रह गए जब उन्होंने देखा कि भूमि पर दूर-दूर तक कृषि का कोई नामोनिशान नहीं था। जमीन पूरी तरह से बंजर अवस्था में लावारिस छोड़ी गई थी।
संबंधित पक्षों को मिला पूरा मौका, नहीं दे पाए कोई साक्ष्य
प्रशासन ने इस पूरी विधिक प्रक्रिया में पारदर्शिता और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पूरा पालन किया। उप जिलाधिकारी न्यायालय द्वारा संबंधित सभी पक्षों को अपना पक्ष रखने, आवश्यक अभिलेख (जमीन के दस्तावेज) और अपनी बेगुनाही के साक्ष्य प्रस्तुत करने का专समुचित और पर्याप्त अवसर प्रदान किया गया था।
इसके पश्चात, न्यायालय द्वारा जमीन क्रय संबंधी मूल अनुमति पत्र, राजस्व अभिलेखों में दर्ज प्रविष्टियों, अनुमति की सख्त शर्तों, उपलब्ध कराए गए साक्ष्यों और राजस्व टीम की विस्तृत स्थलीय जांच आख्या (ग्राउंड रिपोर्ट) का गहन परीक्षण किया गया। इस विस्तृत स्क्रूटनी में यह पूरी तरह प्रमाणित हो गया कि संबंधित भूमि का उपयोग उस विशिष्ट प्रयोजन (धार्मिक और कृषि) के लिए कतई नहीं किया गया, जिसके आधार पर उन्हें उत्तराखंड में जमीन खरीदने की विशेष अनुमति प्रदान की गई थी।
न्यायालय का फैसला: समस्त भारों से मुक्त होकर सरकारी हुई जमीन
सभी तथ्यों और सबूतों के मद्देनजर, न्यायालय उपजिलाधिकारी, नैनीताल ने सातों प्रकरणों में किए गए भूमि अंतरणों (रजिस्ट्री/ट्रांसफर) को पूरी तरह से विधि-विरुद्ध (अवैध) करार दिया। कोर्ट ने तत्काल आदेश पारित करते हुए कुल 1.822 हेक्टेयर भूमि को सभी प्रकार के बंधकों और भारों से मुक्त करते हुए उत्तराखंड राज्य सरकार के स्वामित्व में निहित करने का अंतिम फैसला सुना दिया।
न्यायालय के इस सख्त आदेश के तुरंत अनुपालन में संबंधित क्षेत्र के राजस्व अधिकारियों (तहसीलदार और पटवारियों) को सरकारी राजस्व अभिलेखों (खतौनी) में आवश्यक प्रविष्टियां अंकित करने के कड़े निर्देश जारी कर दिए गए हैं। सरकारी रिकॉर्ड में अब इस जमीन के आगे ‘उत्तर प्रदेश जमींदारी विनाश अधिनियम की धारा 166/167 के तहत राज्य सरकार में निहित’ दर्ज किया जा रहा है। साथ ही कब्जे की अग्रिम विधिक कार्रवाई सुनिश्चित करने के आदेश भी दे दिए गए हैं।
धामी सरकार की इस बड़ी कार्रवाई से साफ संदेश गया है कि उत्तराखंड में निवेश या किसी भी काम के बहाने जमीन लेकर उसे ‘होल्ड’ करने या लैंड बैंक बनाने वाले तत्वों के दिन अब लद चुके हैं।
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