पित्रों के श्राद्ध कल से: पितृ पक्ष में 15 दिनों तक रहेगा पूर्वजों की सेवा का महापर्व, जानिए तिथि, शुभ मुहूर्त और तर्पण के नियम

pitron-ke-shradh कल से विधिवत रूप से शुरू होने जा रहे हैं, जिसके साथ ही सनातन धर्म में पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का महापर्व आरंभ हो जाएगा। भाद्रपद मास की पूर्णिमा तिथि से लेकर आश्विन मास की अमावस्या तक चलने वाले इन 15 दिनों में हिंदू धर्मावलंबी अपने पूर्वजों का स्मरण करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस अवधि में यमलोक से पितर अपने वंशजों को आशीर्वाद देने पृथ्वी लोक पर आते हैं। श्रद्धापूर्वक किया गया तर्पण और पिंडदान पितरों को तृप्त करता है, जिससे घर में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है।

pitron-ke-shradh श्राद्ध 2026 की शुरुआत और समापन

पंचांग के अनुसार, इस वर्ष पितृ पक्ष की शुरुआत कल यानी भाद्रपद पूर्णिमा से हो रही है। अगले 15 दिनों तक विभिन्न तिथियों पर उन पूर्वजों का श्राद्ध किया जाएगा, जिनका देहावसान जिस तिथि पर हुआ था। इस महापर्व का समापन आश्विन मास की अमावस्या यानी सर्वपितृ अमावस्या को होगा। जिन पितरों की मृत्यु की तिथि ज्ञात नहीं होती, उनका श्राद्ध अमावस्या के दिन किया जाता है।

धार्मिक ग्रंथों में pitron-ke-shradh का महत्व

शास्त्रों में ‘श्रद्धया क्रियते इति श्राद्धम्’ कहा गया है, जिसका अर्थ है कि जो कार्य पूरी श्रद्धा के साथ किया जाए, वही श्राद्ध है। सनातन परंपरा में देव पूजा से भी पहले पितृ पूजा का विधान बताया गया है। माना जाता है कि यदि पितर प्रसन्न न हों, तो देवताओं की पूजा का फल भी पूर्ण रूप से प्राप्त नहीं होता। पितृ दोष से मुक्ति पाने और जीवन में चल रही बाधाओं को दूर करने के लिए यह समय सबसे उत्तम माना जाता है। इस दौरान किए गए दान-पुण्य का फल सीधे हमारे पूर्वजों को प्राप्त होता है।

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pitron-ke-shradh के लिए तर्पण और पिंडदान का शुभ मुहूर्त

ज्योतिषविदों के अनुसार, श्राद्ध कर्म हमेशा दोपहर के समय किया जाना चाहिए। इसे शास्त्रों में ‘कुतुप काल’ और ‘रोहिण काल’ कहा जाता है। सुबह के समय देव पूजा और दोपहर के समय पितृ पूजा का नियम है।

कुतुप मुहूर्त: दोपहर 11:45 बजे से 12:30 बजे तक।

रोहिण मुहूर्त: दोपहर 12:30 बजे से 01:15 बजे तक।

अपराह्न काल: दोपहर 01:15 बजे से 03:30 बजे तक।

श्राद्ध की पूजा और तर्पण हमेशा अपराह्न काल के समाप्त होने से पहले संपन्न कर लेनी चाहिए, क्योंकि सूर्यास्त के बाद श्राद्ध कर्म वर्जित माना गया है।

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कैसे करें पितरों का तर्पण? जानिए सरल विधि

pitron-ke-shradh के दौरान प्रतिदिन सुबह स्नान करने के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद तांबे या पीतल के पात्र में स्वच्छ जल लें। उस जल में गंगाजल, कच्चा दूध, जौ, काले तिल और सफेद चंदन मिलाएं। हाथों में कुशा (एक प्रकार की घास) धारण करके दक्षिण दिशा की ओर मुख करके बैठें। इसके बाद अंजलि में जल भरकर अपने पितरों का नाम लेते हुए अंगूठे की ओर से जल को गिराएं। इसे ‘पितृ तीर्थ’ से जल देना कहा जाता है। तर्पण करते समय मन में अपने पूर्वजों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता का भाव होना अनिवार्य है।

pitron-ke-shradh में पंचबलि भोग का विशेष नियम

श्राद्ध के दिन बनाए गए भोजन का सबसे पहला अंश अग्नि को समर्पित किया जाता है। इसके बाद पांच विशेष जीवों के लिए भोजन निकाला जाता है, जिसे ‘पंचबलि’ कहा जाता है। इसके बिना pitron-ke-shradh का कर्म अधूरा माना जाता है।

गौ बलि (गाय): गाय में सभी देवताओं का वास माना जाता है, इसलिए पहला ग्रास गाय को दें।

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श्वान बलि (कुत्ता): कुत्ता यमराज का पशु माना जाता है, इसे भोजन देने से यम का भय दूर होता है।

काक बलि (कौआ): कौए को पितरों का संदेशवाहक माना जाता है। कौए द्वारा भोजन ग्रहण करना पितरों की तृप्ति का संकेत है।

देवादि बलि (चींटियां): चींटियों और अन्य कीटों के लिए भोजन जमीन पर रखा जाता है।

ब्राह्मण भोज: पंचबलि निकालने के बाद आदरपूर्वक ब्राह्मण को भोजन कराएं और यथाशक्ति दान-दक्षिणा देकर विदा करें।

पितृ पक्ष में क्या करें और क्या न करें?

क्या करें: इन 15 दिनों में पूरी तरह सात्विक जीवन जिएं। प्रतिदिन गीता का पाठ करें या ‘ॐ पितृभ्यः नमः’ मंत्र का जाप करें। गरीबों और जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र और जल का दान करें।

क्या न करें: pitron-ke-shradh के दौरान घर में तामसिक भोजन (प्याज, लहसुन, मांस, मदिरा) का प्रयोग बिल्कुल न करें। इस अवधि में नए वस्त्र खरीदना, गृह प्रवेश, मुंडन, विवाह या कोई भी मांगलिक कार्य करना वर्जित माना गया है। घर के दरवाजे पर आए किसी भी भिक्षु या पशु-पक्षी का अपमान न करें।

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