कजरारी आंखें और बेमिसाल सादगी! इस बार नैनीताल में मूर्तिकारों ने मां नंदा-सुनंदा के चेहरे पर बिखेरी अनोखी सौम्यता

नैनीताल। (Maa Nanda Sunanda Nainital) हिमालय की ऊंची चोटियों से उतरकर जब कुमाऊं की आराध्य कुलदेवी और जन-जन की लाडली बेटियां मां नंदा और मां सुनंदा अपने मायके पहुंचती हैं, तो पहाड़ों का जर्रा-जर्रा भक्ति और वात्सल्य के एक अनोखे रस में डूब जाता है। ऐतिहासिक नयना देवी मंदिर परिसर में पारंपरिक वैदिक मंत्रोच्चार और प्राण-प्रतिष्ठा के बाद जैसे ही आम श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए पट खोले गए, वैसे ही वहां उपस्थित हजारों भक्तों की आंखें छलक उठीं। इस बार के महोत्सव की सबसे बड़ी और खास चर्चा का विषय कोई तामझाम नहीं, बल्कि मां नंदा सुनंदा नैनीताल की पावन मूर्तियों में झलक रही असीम सौम्यता, शांति और एक ममतामयी मां की अलौकिक मुस्कान है।

हर साल मूर्तिकार मां के दिव्य स्वरूप को मिट्टी, बांस और कपड़ों से आकार देते हैं, लेकिन इस बार मूर्तियों में जो भाव उकेरा गया है, वह किसी जादू से कम नहीं है। मूर्तियों को करीब से देखने वाले श्रद्धालुओं का कहना है कि मां की बड़ी-बड़ी कजरारी आंखों और हल्के से मुस्कुराते होठों को देखकर ऐसा लगता है मानो कोई बेटी सालों बाद अपने मायके आकर बेहद सुरक्षित, खुश और शांत महसूस कर रही हो।

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कलाकारों ने इस बार रौद्र रूप या भारी-भरकम बनावट की जगह चेहरे की कोमलता और सादगी पर विशेष ध्यान केंद्रित किया है। मां नंदा और सुनंदा की जुड़वां मूर्तियों के इस सौम्य रूप का असर यह है कि मंदिर में प्रवेश करते ही भक्तों का सारा मानसिक तनाव और थकान पल भर में गायब हो जा रही है। स्थानीय बुजुर्गों का मानना है कि मां का ऐसा ममतामयी रूप दशकों बाद देखने को मिला है, जो सीधे आत्मा को छूता है।

उत्तराखंड की इस समृद्ध सांस्कृतिक विरासत की सबसे खूबसूरत बात इसकी प्रकृति से जुड़ी परंपराएं हैं। मां नंदा सुनंदा नैनीताल की इन भव्य मूर्तियों को बनाने के लिए किसी भी प्रकार के केमिकल, प्लास्टर ऑफ पेरिस (POP) या हानिकारक कृत्रिम रंगों का इस्तेमाल बिल्कुल नहीं किया गया है। सदियों पुरानी परंपरा के अनुसार, नैनीताल के पास के जंगलों व ग्रामीण इलाकों से पवित्र कदली वृक्षों (केले के पेड़ के तनों) को पूरे लाव-लश्कर और पारंपरिक वाद्य यंत्रों की थाप के साथ लाया जाता है।

इन्हीं तनों के रेशों, शुद्ध रूई, पहाड़ी बांस की खपच्चियों और स्थानीय मिट्टी के मिश्रण से इन मूर्तियों को गढ़ा जाता है। इसके ऊपर मां को जो वस्त्र पहनाए गए हैं, वे पारंपरिक कुमाऊँनी पिछौड़ा और चमकीली गोटा-पट्टी से सजे डांठ हैं। प्राकृतिक रंगों और पारंपरिक आभूषणों से सजी मां की यह मूर्तियां यह संदेश देती हैं कि हमारी आस्था प्रकृति को नुकसान पहुंचाए बिना भी कितनी भव्य हो सकती है।

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देश-विदेश के पर्यटकों संग उमड़ा आस्था का सैलाब

नैनी झील की शांत लहरों के किनारे बसे इस मंदिर परिसर में तड़के ब्रह्ममुहूर्त से ही भक्तों का रेला उमड़ पड़ा। हाथों में ताजे पहाड़ी फूलों की थाली, अक्षत, चंदन और धूप लिए स्थानीय महिलाओं से लेकर देश-विदेश से आए सैलानी भी मां के इस अद्भुत चेहरे को बस एकटक निहारते दिखे। पूरा नैनीताल शहर इस समय शंखध्वनि, विशाल तांबे के भंकोरियों की गूंज और पारंपरिक छोलिया नर्तकों के पैरों के घुंघरुओं की थाप से जीवंत हो उठा है।कुमाऊं मंडल के साथ-साथ गढ़वाल और उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती जिलों से भी लोग सिर्फ मां के इस विशेष रूप का आशीर्वाद लेने पहुंचे हैं। कतारों में खड़े श्रद्धालुओं का उत्साह देखने लायक है, जो घंटों इंतजार के बाद भी सिर्फ एक बार ‘जय मां नंदा-सुनंदा’ का उद्घोष कर अपनी सारी थकान भूल जा रहे हैं।

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भावुक विदाई और डोला यात्रा की तैयारियां शुरू

यह महोत्सव केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह पहाड़ों के इंसानों और देवताओं के बीच के उस जज्बाती रिश्ते की कहानी है, जहां भगवान को भी परिवार का सदस्य माना जाता है। आने वाले दिनों में मां नंदा-सुनंदा की इन सौम्य मूर्तियों को एक भव्य और विशाल डोले में विराजमान कर पूरे नैनीताल नगर में भ्रमण कराया जाएगा। नगर भ्रमण के दौरान स्थानीय लोग अपने घरों की छतों से मां पर फूलों की वर्षा करेंगे और अपनी बेटियों की सुख-समृद्धि की मन्नत मांगेंगे।

इसके बाद, पारंपरिक ‘न्यावली’ और ‘शकुनाखर’ (विदाई के लोकगीत) गाते हुए, बेहद भावुक माहौल में मां की इन प्रतिमाओं को नैनी झील के पवित्र जल में विसर्जित किया जाएगा। विसर्जन का यह क्षण हर किसी की आंख को नम कर जाता है, क्योंकि कुमाऊंनी समाज अपनी लाडली बेटियों को ढेर सारा प्यार और आशीर्वाद देकर भारी मन से वापस उनके ससुराल (हिमालय की चोटियों) विदा करता है। मां के चेहरे की यह सौम्यता विसर्जन के दिन तक भक्तों के दिलों में एक गहरी शांति और सकारात्मक ऊर्जा बनकर रची-बसी रहेगी।

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