नैनीताल (Kumkum Joshi DSB Campus) कहते हैं कि नेतृत्व की असली पहचान तब होती है जब कोई व्यक्ति दूसरों की समस्याओं को सिर्फ देखता नहीं, बल्कि उन्हें दूर करने के लिए खुद जिम्मेदारी उठाने आगे आता है। उत्तराखंड के प्रसिद्ध डीएसबी परिसर नैनीताल (DSB Campus Nainital) के छात्रसंघ चुनाव में कुछ ऐसा ही प्रेरणादायक उदाहरण सामने आया है। बागेश्वर की रहने वाली कुमकुम जोशी ने परिसर में निर्विरोध छात्रा उपाध्यक्ष (Girls’ Vice President) का पद हासिल कर एक नई मिसाल पेश की है। बुनियादी सुविधाओं के अभाव और हॉस्टल की परेशानियों से शुरू हुआ उनका सफर अब छात्र राजनीति के सबसे बड़े मंच तक पहुंच चुका है।
मूल रूप से उत्तराखंड के बागेश्वर जिले की रहने वाली कुमकुम जोशी नैनीताल के डीएसबी परिसर में रहकर बीएससी (B.Sc.) की पढ़ाई कर रही हैं। परिसर के ही केपी गर्ल्स हॉस्टल (KP Girls Hostel) में रहने के दौरान उन्होंने छात्राओं की कई गंभीर और रोजमर्रा की समस्याओं को बहुत करीब से महसूस किया। पानी की किल्लत, साफ-सफाई की कमी से लेकर सुरक्षा और कैंपस की अन्य सुविधाओं के लिए छात्राओं को आए दिन संघर्ष करना पड़ता था।
कुमकुम का कहना है कि उन्होंने देखा कि हॉस्टल में रहने वाली छात्राओं की आवाज़ को सही मंच पर उठाने वाला कोई ठोस प्रतिनिधि नहीं था। जब भी कोई समस्या होती, छात्राएं आपस में ही परेशान होकर रह जाती थीं। इसी बेबसी ने कुमकुम के भीतर के नेतृत्व को जगाया। उन्होंने तय किया कि वह किसी और के आगे आने का इंतजार करने के बजाय, खुद छात्राओं की मजबूत आवाज बनेंगी। एक बाहरी जिले से आकर, हॉस्टल के सीमित संसाधनों के बीच छात्र राजनीति में उतरने का फैसला करना आसान नहीं था, लेकिन छात्राओं की तकलीफों ने उन्हें इस राह पर बढ़ने का हौसला दिया।

निर्विरोध जीत: भरोसे और एकता का प्रतीक
छात्र राजनीति में जहां हर एक वोट के लिए कड़ी जंग होती है, वहीं कुमकुम जोशी का निर्विरोध निर्वाचित होना बेहद खास है। उनका निर्विरोध चुना जाना इस बात का प्रमाण है कि डीएसबी परिसर के छात्र-छात्राओं ने उनकी नीयत, उनकी सादगी और उनके मुद्दों पर पूरा भरोसा जताया है। यह जीत न सिर्फ कुमकुम की है, बल्कि कैंपस की उन तमाम छात्राओं की एकजुटता की जीत है जो बदलाव चाहती थीं।
अपनी इस ऐतिहासिक सफलता पर बेहद विनम्र रहते हुए कुमकुम ने इसका पूरा श्रेय अपने माता-पिता, कॉलेज के गुरुजनों और अपने उन साथी सहपाठियों को दिया है, जिन्होंने कदम-कदम पर उनका साथ दिया। उनकी इस बड़ी जीत से पूरे कॉलेज परिसर के साथ-साथ नैनीताल के स्थानीय निवासियों में भी भारी उत्साह है। नैनीताल के स्थानीय निवासी हितेश जोशी सहित कई गणमान्य लोगों ने कुमकुम को इस जिम्मेदारी के लिए बधाई और भविष्य के लिए ढेरों शुभकामनाएं दी हैं।
संस्कारी और अनुशासित पारिवारिक पृष्ठभूमि
कुमकुम की इस सफलता के पीछे उनकी मजबूत पारिवारिक पृष्ठभूमि का भी बड़ा हाथ है। उनके पिता ललित मोहन जोशी बागेश्वर में लोक निर्माण विभाग (PWD) में कार्यरत हैं और अपनी ईमानदारी व कर्तव्यनिष्ठा के लिए जाने जाते हैं। वहीं, उनकी माता हेमा जोशी एक कुशल गृहिणी हैं, जिन्होंने कुमकुम को हमेशा जमीन से जुड़े रहने और समाज की सेवा करने के संस्कार दिए हैं। एक मध्यमवर्गीय परिवार से निकलकर नैनीताल जैसे प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान में छात्रसंघ का अहम पद संभालना उनके माता-पिता के लिए भी बेहद गर्व का क्षण है।
“पद नहीं, यह छात्राओं की सेवा का अवसर है”
जीत के बाद मीडिया से मुखातिब होते हुए कुमकुम जोशी के तेवर एक परिपक्व राजनेता जैसे नजर आए। उन्होंने बेहद स्पष्ट शब्दों में कहा, “छात्रसंघ में मिली यह जिम्मेदारी मेरे लिए सिर्फ एक पद या रूतबा नहीं है। यह मेरे लिए अपनी उन बहनों की समस्याओं को उठाने और उनके हक के लिए लड़ने का एक जरिया है, जो हॉस्टल और कैंपस में परेशानियां झेलती हैं।
कुमकुम ने साफ किया कि परिसर में छात्राओं की सुरक्षा को पुख्ता करना, हॉस्टल की बुनियादी व्यवस्थाओं को सुधारना और छात्राओं को एक भयमुक्त व शैक्षणिक माहौल देना उनकी सबसे पहली प्राथमिकता रहेगी। इसके साथ ही, वे सिर्फ छात्राओं तक ही सीमित नहीं रहेंगी, बल्कि छात्रों से जुड़े हर गंभीर मुद्दे पर भी उतनी ही मुस्तैदी से काम करेंगी।
छात्र राजनीति से मुख्यधारा की राजनीति का बड़ा लक्ष्य
छात्रा उपाध्यक्ष बनने के साथ ही कुमकुम जोशी ने अपने भविष्य को लेकर बेहद ऊंचे और स्पष्ट लक्ष्य तय कर लिए हैं। अधिकांश लोग छात्र राजनीति को कॉलेज के दिनों का एक शौक मानते हैं, लेकिन कुमकुम इसे अपने करियर और जीवन का मुख्य ध्येय बना चुकी हैं। उन्होंने ऐलान किया है कि वह भविष्य में मुख्यधारा की राजनीति (Mainstream Politics) में अपना करियर बनाना चाहती हैं।
उनका मानना है कि यदि युवाओं को देश और समाज की दशा बदलनी है, तो उन्हें राजनीति की गंदगी से दूर भागने के बजाय खुद इसका हिस्सा बनकर इसे साफ करना होगा। छात्रसंघ से शुरू हो रही उनकी यह छोटी सी राजनीतिक यात्रा आने वाले समय में उत्तराखंड और देश के बड़े राजनीतिक पटल पर एक नई पहचान बनाने की दिशा में पहला कदम है।
युवा लीडरशिप के लिए एक नई प्रेरणा
उत्तराखंड की राजनीति में हमेशा से ही महिलाओं की भागीदारी बेहद महत्वपूर्ण रही है, लेकिन नीति-निर्धारण के उच्च स्तरों पर आज भी युवा महिलाओं की संख्या कम है। ऐसे में कुमकुम जोशी जैसी महत्वाकांक्षी और जागरूक छात्राओं का आगे आना एक बेहद सकारात्मक संकेत है।हॉस्टल की दिक्कतों से परेशान होकर रोने या व्यवस्था को कोसने के बजाय, व्यवस्था का हिस्सा बनकर उसे ठीक करने का कुमकुम का यह जज्बा आज प्रदेश के हजारों युवाओं के लिए एक मिसाल है। डीएसबी परिसर की नई छात्रा उपाध्यक्ष से अब पूरे कॉलेज को बड़ी उम्मीदें हैं, और देखना होगा कि वे अपने इस कार्यकाल में छात्र हितों के संघर्ष को कितनी नई ऊंचाइयों पर ले जाती हैं।