ज्योलिकोट में जलजनित बीमारी का तांडव: IIT रुड़की और पंतनगर के वैज्ञानिकों ने किया निरीक्षण, STP सीवर लाइन शक के घेरे में

ज्योलिकोट नैनीताल। Jeolikote water borne disease उत्तराखंड के पर्यटन क्षेत्र ज्योलिकोट और उसके आसपास के इलाकों में पैर पसार रही जलजनित बीमारियों ने प्रशासन और स्वास्थ्य महकमे की नींद उड़ा दी है। क्षेत्र में दूषित पानी के कारण लगातार बीमार हो रहे लोगों की स्थिति को गंभीरता से लेते हुए शासन द्वारा एक उच्च स्तरीय तकनीकी और विशेषज्ञ जांच समिति का गठन किया गया था। इसी क्रम में समिति के शीर्ष वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और प्रशासनिक अधिकारियों के दल ने प्रभावित क्षेत्रों का व्यापक स्थलीय निरीक्षण किया।

निरीक्षण के दौरान टीम ने स्थानीय पेयजल स्रोतों, सीवरेज नेटवर्क, सीवर लाइनों के चैंबरों और सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) की व्यवस्थाओं का मौके पर जायजा लिया। इस दौरान स्थानीय जनप्रतिनिधियों और ग्रामीणों ने सीधे तौर पर STP की सीवर लाइन में लीकेज को इस पूरे संक्रमण का मुख्य कारण बताते हुए कड़ी कार्रवाई की मांग की है।

मामले की संवेदनशीलता और जनस्वास्थ्य से जुड़े होने के कारण इस जांच समिति में उत्तराखंड के सबसे प्रतिष्ठित तकनीकी और वैज्ञानिक संस्थानों के विशेषज्ञों को शामिल किया गया है। स्थलीय निरीक्षण करने पहुंचे दल में मुख्य रूप से आईआईटी रुड़की के सिविल इंजीनियरिंग विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर एवं माइक्रोबायोलॉजी एक्सपर्ट डॉ. गार्गी सिंह, जी.बी. पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय पंतनगर के माइक्रोबायोलॉजी विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. अजयवीर सिंह, उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के साइंटिफिक ऑफिसर डॉ. राजकुमार चतुर्वेदी और मुख्य पर्यावरण अधिकारी डॉ. अंकुर कंसल शामिल रहे।

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इसके साथ ही तकनीकी टीम में उत्तराखंड पेयजल निगम देहरादून के अधीक्षण अभियंता आर.के. जैन और उत्तराखंड जल संस्थान देहरादून के सचिव मनीष सेमवाल शामिल थे, जो इस समिति के सदस्य सचिव और समन्वयक की भूमिका निभा रहे हैं। धरातलीय व्यवस्थाओं को स्पष्ट करने के लिए जल संस्थान के अधिशासी अभियंता अनिश एम. पिल्लई, सहायक अभियंता परिहार, सहायक अभियंता हर्षित कुमार और कनिष्ठ अभियंता ललित मोहन सहित विभाग के कई अन्य तकनीकी कर्मचारी भी मौके पर उपस्थित रहे।

निरीक्षण के दौरान जांच समिति ने प्रभावित क्षेत्र के ग्राम प्रधान नवल कुमार और उप प्रधान मनोज सिंह बरगली से मुलाकात कर बीमारी की वर्तमान स्थिति, प्रभावित मरीजों की संख्या और संक्रमण के फैलने के तरीकों पर विस्तार से चर्चा की। जनप्रतिनिधियों और क्षेत्रवासियों ने समिति के सामने बेहद कड़े शब्दों में अपनी बात रखी। ग्रामीणों ने साक्ष्यों के साथ समिति को स्पष्ट बताया कि क्षेत्र में स्थापित STP की सीवर लाइन के चैंबर जगह-जगह से पूरी तरह लीकेज हो रहे हैं। इस सीवर लाइन का अत्यधिक दूषित और मल-युक्त पानी रिसकर सीधे तौर पर प्राकृतिक जल स्रोतों और पीने के पानी की मुख्य सप्लाय लाइनों तक पहुंच रहा है।

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ग्रामीणों का आरोप है कि इसी दूषित पानी के उपभोग के कारण पूरा क्षेत्र महामारी की कगार पर खड़ा हो गया है। स्थानीय लोगों ने उन विशिष्ट स्थानों और परिस्थितियों को भी रेखांकित किया जहां लंबे समय से सीवरेज का पानी खुले में बह रहा है। मौके पर मौजूद आईआईटी रुड़की और पंतनगर विश्वविद्यालय के माइक्रोबायोलॉजी विशेषज्ञों ने जल स्रोतों और लीकेज वाले संभावित पॉइंट से पानी के सैंपल एकत्र किए हैं। इन सैंपल्स की विस्तृत जैविक और रासायनिक जांच की जाएगी ताकि पानी में मौजूद हानिकारक बैक्टीरिया और वायरस की सटीक पहचान की जा सके।

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तकनीकी टीम यह भी पता लगाएगी कि पानी में संक्रमण किस स्तर पर और किस पॉइंट से मिलना शुरू हुआ।स्थानीय जनता और जनप्रतिनिधियों ने साफ किया है कि स्वच्छ जल हमारा मौलिक अधिकार है और सुरक्षित स्वास्थ्य हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता है। क्षेत्रवासियों ने उम्मीद जताई है कि यह उच्च स्तरीय समिति किसी भी दबाव में आए बिना पूरी तरह से तकनीकी और निष्पक्ष जांच करेगी।

समिति के अधिकारियों ने भी आश्वस्त किया है कि जांच रिपोर्ट के आधार पर जलजनित बीमारी के वास्तविक मूल कारणों को चिन्हित किया जाएगा। साथ ही, भविष्य में ज्योलिकोट के निवासियों को ऐसी जानलेवा स्थिति का सामना न करना पड़े, इसके लिए सीवरेज और पेयजल लाइनों के सुदृढ़ीकरण हेतु एक स्थायी तकनीकी समाधान शासन को प्रेषित किया जाएगा। खबर लिखे जाने तक जल संस्थान और पेयजल निगम के अभियंताओं को लीकेज वाले हिस्सों को तुरंत दुरुस्त करने और पेयजल स्रोतों में ब्लीचिंग व क्लोरीनीकरण की प्रक्रिया को तेज करने के निर्देश दिए गए हैं।

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