ठप हो सकती हैं पहाड़ की स्वास्थ्य सेवाएं! 10 सूत्रीय मांगों को लेकर सड़कों पर उतरीं उत्तराखंड आशा वर्कर्स

अब सितंबर महीने के हर मंगलवार को पीएचसी और सीएचसी स्तर पर उग्र प्रदर्शन करेंगी आशा कार्यकर्ताएं

उत्तराखंड में स्वास्थ्य सेवाओं की रीढ़ मानी जाने वाली uttarakhand-asha-workers (आशा हेल्थ वर्कर्स) ने अपनी लंबित मांगों को लेकर राज्य सरकार के खिलाफ सीधे तौर पर मोर्चा खोल दिया है। उत्तराखंड आशा हेल्थ वर्कर्स यूनियन के आह्वान पर एक सितंबर से पूरे प्रदेश में जोरदार धरना-प्रदर्शन शुरू हो गया है। इन uttarakhand-asha-workers ने मुख्यमंत्री को ज्ञापन भेजकर साफ शब्दों में चेतावनी दी है कि यदि आगामी विधानसभा चुनाव से पहले उनकी मांगें पूरी नहीं हुईं, तो वे पूरे राज्य में अनिश्चितकालीन आंदोलन करने के लिए मजबूर हो जाएंगी और इसकी पूरी जिम्मेदारी प्रदेश सरकार की होगी।

मंगलवार को नैनीताल के तल्लीताल गांधी मूर्ति के पास कार्यकर्ताओं ने नारेबाजी की। यूनियन का आरोप है कि राज्य सरकार पांच साल पहले खटीमा में किए गए अपने वादे को पूरी तरह भूल चुकी है। साल 2021 में हुए आंदोलन के बाद सरकार ने uttarakhand-asha-workers के प्रतिनिधियों के साथ बैठक की थी, जिसमें मासिक मानदेय तय करने और स्वास्थ्य महानिदेशक के प्रस्ताव को लागू करते हुए हर महीने साढ़े ग्यारह हजार रुपये देने का भरोसा दिया गया था। इस वादे को बीते लंबा समय हो चुका है, लेकिन जमीन पर कुछ नहीं बदला।

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यूनियन का कहना है कि एक तरफ तो विधायकों के वेतन और भत्ते लगातार बढ़ाए जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ दिन-रात स्वास्थ्य सेवाओं को संभालने वाली इन uttarakhand-asha-workers को एक दिहाड़ी मजदूर से भी कम पैसा मिल रहा है, जो कि पूरी तरह से अन्यायपूर्ण है।अपनी मांगों को लेकर uttarakhand-asha-workers ने मुख्यमंत्री के सामने स्पष्ट रूप से दस प्रमुख बातें रखी हैं, जिनमें नियमितीकरण और पेंशन सबसे मुख्य हैं। ये uttarakhand-asha-workers चाहती हैं कि खटीमा में किए गए वादे के मुताबिक तत्काल मासिक मानदेय लागू किया जाए।

इसके साथ ही आगामी विधानसभा सत्र में इन स्वास्थ्य कर्मियों को सरकारी कर्मचारी का दर्जा देने और न्यूनतम वेतन तय करने का प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार को भेजा जाए। कार्यकर्ताओं की यह भी मांग है कि जब तक स्थायी पेंशन की व्यवस्था नहीं हो जाती, तब तक रिटायर होने वाली हर आशा कार्यकर्ता को दस लाख रुपये की एकमुश्त राशि दी जाए। विभिन्न कार्यों के लिए मिलने वाले पैसों को महीनों तक अटकाने के बजाय हर महीने समय पर देना जरूरी किया जाए।इसके अलावा ट्रेनिंग और पल्स पोलियो अभियान के दौरान प्रतिदिन पांच सौ रुपये का भुगतान करने, सरकारी अस्पतालों में uttarakhand-asha-workers के साथ सम्मानजनक व्यवहार करने के आदेश जारी करने तथा अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टरों के खाली पदों को तुरंत भरने की मांग उठाई गई है।

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इन कार्यकर्ताओं के रुकने के लिए अस्पतालों में आशा घरों का निर्माण हो और नेशनल हेल्थ मिशन का बजट बढ़ाकर इसमें से गैर-सरकारी संगठनों यानी एनजीओ का दखल पूरी तरह खत्म किया जाए। साथ ही मनमाने बहाने बनाकर कार्यकर्ताओं की छंटनी करने की कोशिशों को भी तुरंत बंद किया जाए।इस राज्यव्यापी आंदोलन और मुख्यमंत्री को सौंपे गए मांग पत्र को उत्तराखंड आशा हेल्थ वर्कर्स यूनियन की मुख्य पदाधिकारी कमला कुंजवाल के नेतृत्व में मजबूती से आगे बढ़ाया जा रहा है। इस संघर्ष में प्रदेश भर की uttarakhand-asha-workers को एकजुट करने और अपनी आवाज बुलंद करने वालों में शशि आर्या, चम्पा जोशी, चंद्रा खती, निर्मला चंद्रा, रश्मि राणा, दुर्गा टम्टा, इन्दुबाला, तुलसी बिष्ट, रेखा रानी, अनीता आर्या, प्रेमा अधिकारी, मनीषा आर्या, देवकी रौतेला, हेमा पाठक, सरिता कुरिया, नीलम बिष्ट, अलका खाती, विमला शाह, हेमा जोशी और सुचित्रा साह जैसी प्रमुख कार्यकर्ताएं शामिल हैं।

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इन सभी कार्यकर्ताओं ने साफ कहा है कि वे स्वास्थ्य विभाग में पूरी लगन से सेवा दे रही हैं, लेकिन सरकार उनका आर्थिक शोषण कर रही है। अब इस लड़ाई को आगे बढ़ाते हुए सितंबर महीने के हर मंगलवार को सभी प्राथमिक और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों पर प्रदर्शन को और तेज किया जाएगा।

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