सरोवर नगरी नैनीताल में इन दिनों 124वें ऐतिहासिक व सांस्कृतिक श्री नंदा देवी महोत्सव की धूम है। Nanda Devi Mahotsav के दूसरे दिन पारंपरिक विधि-विधान के साथ कदली (केले के पेड़) वृक्षों का भव्य नगर भ्रमण कराया गया। ढोल-दमाऊ, मशकबीन और छोलिया नृत्य की थाप पर ‘जय नंदा सुनंदा’ के जयकारों से पूरी सरोवर नगरी गुंजायमान हो उठी।इस भव्य शोभायात्रा के दौरान हर किसी की नजरें यात्रा के अनुशासन और वहां लहराते झंडों पर टिक गईं। इस यात्रा में सबसे आगे सफेद ध्वज और उसके ठीक पीछे लाल ध्वज चल रहा था। लेकिन क्या आप जानते हैं कि मां नंदा के इस पावन उत्सव में इन लाल और सफेद झंडों का क्या महत्व है और यह परंपरा कहाँ से शुरू हुई? आइए जानते हैं इस ऐतिहासिक यात्रा की पूरी इनसाइड स्टोरी।
कुमाऊं की संस्कृति में ‘निशाण’ हैं ये झंडे, जानिए क्या है रहस्य
नैनीताल की प्रसिद्ध संस्था श्री राम सेवक सभा के वरिष्ठ पदाधिकारियों और सांस्कृतिक विशेषज्ञों के अनुसार, इन झंडों को कुमाऊंनी लोक संस्कृति में ‘निशाण’ कहा जाता है। यह परंपरा आज की नहीं, बल्कि सदियों पुरानी है।प्राचीन काल में जब उत्तराखंड (कुमाऊं) के राजा किसी युद्ध के लिए निकलते थे या किसी बड़े विजय उत्सव का आयोजन करते थे, तो उनके दल के आगे ये झंडे विजय और राजशाही पहचान के रूप में चलते थे। समय के साथ यह शाही परंपरा धार्मिक उत्सवों और कुमाऊं के पारंपरिक विवाहों का अहम हिस्सा बन गई।

सफेद ध्वज (शांति और पवित्रता): श्री नंदा देवी राजजात यात्रा में सबसे आगे चलने वाला सफेद ध्वज शांति, सात्विकता और मानसिक शुद्धता का प्रतीक है। हिमालय की दुर्गम और पावन वादियों में यह झंडा इस बात का संकेत देता है कि मां नंदा की डोली पूर्ण पवित्रता और मर्यादा के साथ आगे बढ़ रही है। यह ध्वज भक्तों के मन को शांत करता है और पूरे यात्रा मार्ग को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर देता है। यह संदेश देता है कि ईश्वर की शरण में जाने के लिए मन का साफ और निर्मल होना सबसे जरूरी है।

लाल ध्वज (ऊर्जा और शक्ति): सफेद झंडे के ठीक पीछे चलने वाला लाल ध्वज मां भगवती की साक्षात शक्ति, ऊर्जा, उत्साह और विजय का प्रतीक है। उत्तराखंड की संस्कृति में लाल रंग को देवी मां के आगमन और सौभाग्य से जोड़कर देखा जाता है। यह ध्वज भक्तों के भीतर छिपे साहस को जगाता है। इसकी प्रेरणा से ही श्रद्धालु ऊंचे और कठिन पहाड़ी रास्तों की चढ़ाई को भारी उत्साह के साथ पार कर लेते हैं। यह दर्शाता है कि भक्ति में केवल शांति ही नहीं, बल्कि जीवन को जीतने की शक्ति भी शामिल है।
जब मां नंदा-सुनंदा की मूर्ति निर्माण के लिए कदली वृक्ष लाया जाता है, तो इन ‘निशानों’ को उठाने वाले विशेष वाहक इन्हें अपने कंधों पर थामकर पूरे नगर में सबसे आगे सम्मानपूर्वक चलते हैं।
मंगोली गांव से शुरू हुआ सफर: प्रकृति और आस्था का अनूठा संगम
महोत्सव के तय नियमों के अनुसार, बुधवार को श्रद्धालुओं का दल पवित्र कदली वृक्ष लेने के लिए कालाढूंगी रोड पर स्थित मंगोली गांव रवाना हुआ था। गांव में रातभर चले धार्मिक अनुष्ठानों और पुरोहित पंडित भगवती प्रसाद जोशी द्वारा संपन्न कराए गए वैदिक पूजन के बाद दो सुंदर कदली वृक्षों को जड़ सहित निकाला गया।पहाड़ की ‘Back to Nature, Back to Culture’ (प्रकृति की ओर लौटें, संस्कृति की ओर लौटें) थीम को साकार करते हुए, पर्यावरण संतुलन बनाए रखने के लिए उसी भूमि पर पर्यावरण प्रेमी यशपाल रावत जी की ओर से दिए गए 21 नए पौधों का रोपण भी किया गया।

क्या मंत्री, क्या अफसर… मां के काज में सब दिखे एक बराबर
इस भव्य डोला यात्रा की सबसे खूबसूरत बात यह रही कि इसमें समाज का हर तबका एक सूत्र में बंधा नजर आया। वीआईपी हस्तियों से लेकर प्रशासनिक अधिकारियों ने खुद अपने कंधों पर कदली वृक्षों को उठाकर पुण्य कमाया।कंधा लगाने वालों में नगर पालिका अध्यक्ष डॉ. सरस्वती खेतवाल, दर्जा राज्य मंत्री दिनेश आर्य, शांति मेहरा, सांसद प्रतिनिधि गोपाल रावत, एसपी डॉ. जगदीश चंद्र और सीओ अंजना नेगी शामिल रहे। यात्रा में मोहित लाल साह, सावित्री सनवाल, विक्रम साह और सभासद लता दफौटी भी श्रद्धापूर्वक चलते नजर आए।
शुक्रवार से शुरू होगा दिव्य मूर्तियों का निर्माण
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, केले के पेड़ (कदली) में भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी, भगवान शिव और देवगुरु बृहस्पति का वास होता है। इसी पवित्र आधार का उपयोग कर कल से ही कुमाऊं के सिद्धहस्त लोक पारंपरिक कलाकारों द्वारा मां नंदा और मां सुनंदा की दिव्य मूर्तियों का निर्माण शुरू कर दिया जाएगा, जिनकी 19 सितंबर को ब्रह्ममुहूर्त में प्राण-प्रतिष्ठा की जाएगी।